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बजट से उपनगरीय ट्रेनों के किराए में हो सकती है वृद्धि

Budget may increase the fares of suburban trains

बजट से उपनगरीय ट्रेनों के किराए में हो सकती है वृद्धि
किराया बढ़ने से 467 करोड़ यात्री होंगे प्रभावित

नई दिल्ली। लंबी दूरी की ट्रेनों के किराये तो पांच-सात साल में बढ़ भी जाते हैं। मगर उपनगरीय ट्रेनों का किराया फिर भी नहीं बढ़ता। पिछले दिनो भी यही हुआ, जब रेलवे ने 1 जनवरी से बाकी ट्रेनों के किराये तो कुछ हद तक बढ़ा दिए। परंतु उपनगरीय ट्रेनों के किरायों को छूने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। पहली फरवरी को पेश होने वाले आम बजट में इस कमी को पूरा करने के संकेत मिल सकते हैं। हालांकि इसका विधिवत ऐलान बजट सत्र के दूसरे चरण में होने की संभावना है।

रेल किरायों को दो किस्तों में बढ़ाने का प्रयोग

रेल किरायों को दो किस्तों में बढ़ाने का ये प्रयोग उपनगरीय किरायों की अधिक राजनीतिक संवदेनशीलता के मद्देनजर करना पड़ रहा है। जिसके ग्राहक मुख्यतया मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में हैं, जिनमें एक मौजूदा रेलमंत्री और दूसरा पूर्व रेलमंत्री का इलाका है। जहां ममता बनर्जी रेलवे में किसी भी तरह की किराया वृद्धि के खिलाफ रही हैं। वहीं गोयल का शुमार उचित किराया वृद्धि के पैरोकारों में होता है। मेल/एक्सप्रेस के किरायों में मामूली बढ़ोतरी की अनुमति देकर उन्होंने इसे साबित भी किया है। लेकिन कैग, नीति आयोग और रेलवे बोर्ड के सुझाव के बावजूद उपनगरीय ट्रेनों के किराये बढ़ाने की हिम्मत वे भी नहीं दिखा सके।

रेलवे की आमदनी में उपनगरीय यातायात का हिस्सा 6 फीसद
भारत में हर साल तकरीबन 830 करोड़ यात्री ट्रेनों से सफर करते हैं। इनमें 467 करोड़ अर्थात 57 फीसद यात्री उपनगरीय अर्थात लोकल ट्रेनों से और बाकी लंबी दूरी की मेल/एक्सप्रेस या पैसेंजर ट्रेनों से चलते हैं। इसके बावजूद यात्री यातायात से होने वाली 55 हजार करोड़ रुपये की आमदनी में उपनगरीय यातायात का हिस्सा महज 6 फीसद की है।

इसकी वजह उपनगरीय किरायों का हद से ज्यादा कम होना है। जहां मेल/एक्सप्रेस/पैसेंजर के प्रत्येक यात्री से प्रति किलोमीटर औसतन 45 पैसे की आमदनी होती है। वहीं उपनगरीय ट्रेनों से प्रति यात्री, प्रति किलोमीटर महज 19 पैसे प्राप्त होते हैं। नीति आयोग ने इस अंतर को कम करने के लिए उपनगरीय आमदनी को प्रति यात्री प्रति किलोमीटर 23 पैसे के स्तर पर लाने का सुझाव दिया है।

दिल्ली चुनाव के कारण बजट में नहीं होगा एलान
माना जाता है कि महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राजनीतिक समीकरणों के कारण गोयल ने पहली बार में केवल लंबी दूरी के किरायों को छेड़ने और उपनगरीय किरायों को आगे के लिए टालने का सुझाव दिया था। अब जबकि महाराष्ट्र में विपक्ष की सरकार बन चुकी है और बंगाल में भी एनआरसी, सीएए और एनपीआर के विरोध की उग्रता थम गई है तथा लंबी दूसरी के किरायों को जनता ने स्वीकार कर लिया है, उपनगरीय किरायों को भी बढ़ाया ना संभव हो गया है।

हालांकि सूत्रों के मुताबिक दिल्ली चुनाव को देखते हुए बजट में केवल इसका संकेत होगा जबकि 1 अप्रैल से बजट के साथ ही इसे वास्तविक रूप से लागू किया जाएगा।

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